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महिला दिवस पर ये post जरूर देखें womens day post।

 अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस: देश में महिलाओं को कमतर आंकने की सोच बढ़ी, UN अध्ययन में हुआ दावा।
  

👉celebrate women's achievements
👉raise awareness about women's equality
👉lobby for accelerated gender parity
👉fundraise for female-focused charities
 

Couple==========================

भारत में समय के साथ लड़कियों से भेदभाव और उन्हें कमतर आंकने की मानसिक बढ़ती जा रही है। संयुक्त राष्ट्र का वैश्विक अध्ययन इस बात का दावा करता है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, भारत दुनिया के उन चार देशों में शामिल है, जहां ऐसे पुरुषों की संख्या में तेजी से कमी आ रही है जो महिलाओं को किसी भी मामले में कमतर नहीं समझते। वर्तमान में देश की 1.2 फीसदी आबादी ही ऐसी है जो महिलाओं से किसी तरह का भेदभाव नहीं करती। जबकि दस साल पहले ऐसे आधुनिक सोच वाले लोगों की तादाद 8.6 फीसदी थी। 

बदलाव स्वीकारने को समाज तैयार नहीं 
संयुक्त राष्ट्र के इन आंकड़ों के बारे में प्रतिष्ठित संस्था इंडिया स्पेंड का कहना है कि भारत का समाज जेंडरभेद खत्म करने से जुड़े व्यक्तिगत, सरकारी अथवा गैर सरकारी कदमों का समर्थन करने के बजाय उसके खिलाफ प्रतिक्रिया दे रहा है। यही कारण है कि जब विरासत में बेटी को बराबर का हक देने की बात आती है तो वह बेटी से रिश्ता ही खत्म कर लेता है। परिवार छोटा करने की बात आती है तो समाज चाहता है कि एक बेटा तो जरूर हो और ऐसे में गर्भपात के मामले बढ़ जाते हैं। यही स्थिति लड़की के नौकरी करने, उसके पहनावे और स्वास्थ्य प्राथमिकताओं को लेकर भी देखी गई है। 


आमदनी बढ़ने का सोच पर असर नहीं 
आमतौर पर सोचा जाता है कि लोग गरीबी के कारण लड़कियों को बोझ मानते हैं पर इंडिया स्पेंड के विश्लेषण के मुताबिक, जहां पिछले 65 वर्षों में देश में प्रति व्यक्ति आय 10 गुना बढ़ गई पर लिंग अनुपात में गिरावट आयी है। 2015-17 के जनसांख्यिकीय सर्वेक्षण के हिसाब से देश में 1000 लड़कों पर 896 ही लड़कियां हैं जबकि 2014-16 के सर्वेक्षण में यह अनुमान 1000 के मुकाबले 898 था। इस स्थिति पर इंडिया स्पेंड का कहना है कि आय बढ़ने पर लोगों में लिंग चयन करने की प्रक्रियाओं की जानकारी और पहुंच आसान हो जाती है। ऐसे में वे अनचाही मादा भ्रूण को दुनिया में न लाने का फैसला लेते हैं जो घटते लिंक अनुपात के रूप में सामने आ रहा है। 

पुरुष ही नहीं महिलाएं भी पूर्वाग्रह की शिकार 
संयुक्त राष्ट्र के जेंडर सामाजिक मानदंड सूचकांक-2020 के हिसाब से भारत में पुरुषों के साथ ही महिलाएं भी महिलाओं के प्रति पूर्वाग्रह की शिकार हैं। महिलाओं के प्रति कोई पूर्वाग्रह न रखने वाले 31 देशों की सूची में भारत पुरुषों के मामले में नीचे से चौथे और महिलाओं के मामले में नीचे से दूसरे नंबर पर है। इस आधार पर संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि भारत व अन्य देशों का समाज बदलाव के खिलाफ प्रतिक्रिया दे रहा है। 

👉Three central beliefs underpin and guide the purpose and provisions of the International Women's Day website:

👉identifying, celebrating and increasing visibility of women's achievements can help forge equality

👉strategic collaborations based on a foundation of shared purpose, trust and appreciation can impact positive change for women

👉worldwide awareness raising via meaningful narratives, resources and activity can help combat gender bias and discrimination to accelerate gender parity

👉To support worldwide activity, the International Women's Day website provides:


नोट-
- 1.2 फीसदी भारतीय आबादी ही महिलाओं के प्रति समानता का भाव रखती है।
- 14 फीसदी महिलाएं और 10 फीसदी पुरुष ही पूरी दुनिया में जेंडर भेद नहीं करते। 
( यूनाइटेड नेशंस जेंडर सामाजिक मानदंड सूचकांक-2020 )


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